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शक्तिहीन मानव
आज इस वायरस (COVID-19) 15.03.2020 से सरकार द्वारा धोषित महामारी ने इंसान को औकाद याद दिला दी, विज्ञान आज धूल चाटता नजर आ रहा है। हमारी मेडिकल साइंस बेबस नजर आ रही है।
वास्तविकता में इंसान कर क्या रहा है, सिर्फ और सिर्फ खुद के वजूद को बचाने की कोशिश। सिर्फ एक गलती इस दुनिया से इंसान नाम की प्रजाति को खत्म करने के लिए काफी है। जिस तरह से कोरोना एक वैश्विक महामारी बन गया है। इसकी वजह भी हम ही है, खुद को शक्तिशाली कहते कहते हम भूल गए, प्रकृति से शक्तिशाली कुछ हो ही नही सकता। हमारा विज्ञान किसी भी दुनिया को खत्म करने का दम भरता है, खुद को महाशक्तिशाली कहता है, तो क्या इस छोटे से वायरस को मार नही सकता। इंसान ने इंसान ओर इंसानियत को मारने के हथियार बना लिए लेकिन इंसान ओर इंसानियत को बचाने वाले हथियार बनाना भूल गया। दुसरो को मारने का सबब तो बना लिया लेकिन अपनो को बचाने की कोई कल्पना भी नही की। आज खुद को बचाने के लिए हम दूसरों को नसीहत दे रहे है बाहर मत निकलो बीमार हो जाओगे। डर इस बात का नही वो बीमार होगा, डर तो ये है कही उसके बीमार होने से कही मै बीमार न हो जाऊं। कुछ हद तक खुदगर्जी कम हुई है, लेकिन मुनाफाखोर इस समय भी बाज नही आ रहे। देश सेवा नही खुद की सेवा करने में लगे है। जो वस्तु रियायती दर पर देनी चाहिए, वो तीन या चार गुना भाव मे दे रहे हैं। आज एक गली से निकला तो देखा एक बूढ़ी माई ठेले पर कुछ सब्जी लेकर चौक की तरफ निकली है, उसे शायद पता भी नही होगा कि शहर में हो क्या रहा है। इतना सन्नाटा क्यों है। बोझिल सी आंखे लोगो को हैरत भरी नजर से देखती हुई। सोचती हुई मुह पर कपड़ा बंधे लोग क्यों घूम रहे है, कोई सामान क्यों नही खरीद रहा। कोई उसके पास क्यों नही आ रहा। आज वो शायद अंदर तक डर गई होगी सोच कर की क्या वो इसी शहर की हैं या नींद में कोई उसे कही और छोड़ आया है। मेने भी उसकी आँखों मे वो हैरत देखी है। घबराई हुई धीमे धीमे कदमो से अपनी लारी को धकेलती हुई। सोचा थोड़ी देर रुकू उसके पास ओर उसे हकीकत से रूबरू करू, लेकिन हमारी कानून व्यवस्था हमे कही रुकने नही देती। लेकिन कुछ पल में ही मुझे उसके मन मे उठ रहे तूफान का अंदाजा हो गया था। शाम को पेट भरने की कवायद के बारे में सोच सोच कर शायद वो कोरोना से पहले ही कही मर न जाये। कई बार मेने सामान्य वक़्त में उससे सब्जी खरीदी भी है। भले की सब्जी ज्यादा ताजी हो न हो, लेकिन उसकी उम्मीद न टूटे उसके लिए मैं रुका हु उसके पास। ऐसे कई घर होंगे जो आज इस महामारी के कारण भूखे पेट रहने को मजबूर है। कुछ दिन की बात हो तो समझ मे आती है। हमे क्या किसी को नही पता आगे और क्या होने वाला है। कब तक ये बाजार का सन्नाटा कायम रहेगा। कोई बच्चा दूध के लिए रो रहा है लेकिन उसके मा बाप दूध नही ला सकते इसलिए नही की बाजार बंद है, क्यों कि आज वो मजदूरी करने नही गया।
बहुत ही भयानक तस्वीर मेरे जेहन में उभर रही है, जैसे मौत का तांडव अभी शुरुआत भर है, जब चारो ओर से बीमारी और भुखमरी दम भरने लगेगी तब इस समाज इस व्यवस्था का क्या होगा। इंसान हर चीज़ से लड़ सकता है खुद भूखा रह सकता है लेकिन अपनो को भूखा तड़प कर मरते आंखों के सामने नही देख सकता। क्या होगा तब जब ऐसा कोई विस्फोट समाज मे होगा। कोरोना से मरेंगे तब मरेंगे लेकिन सिर्फ क्या हम बीमारी से ही मरेंगे।
आज मानव इतिहास का इम्तिहान है, खुद को बचाने की कवायद है, अपने अस्तित्व को बनाये रखने की होड़ है। आज चाहे अमीर हो या गरीब सभी की एक ही चिंता है कब तक वो जिएगा। सोचने भर से आत्मा सिहर उठती है, उस भविष्य के नजारे को देख कर जहा ऊंची ऊंची मंजिले तो नजर आयेंगी लेकिन वहाँ से कोई किलकारी सुनाई नही देगी। चाहे अमीर का बंगला हो या गरीब का झोपड़ा सब वीरान नजर आएंगे।
सबको बंद जुबान में इसका एहसास हे, लेकिन कोई बोल नहीं सकता, अगर बोलता हे तो कहते हैं डरा रहा हैं, क्यू – क्योंकि उनके जेहन में भी यही बात उठ रही हैं, क्या होगा अगर जहा कभी हस्ते खेलते चेहरे ओर चलपहल नजर आती थी वहाँ सन्नाटा नजर आए। आज हर कोई सहमा डरा सा ओर अन्नीचित भविष्य के बारे में सोच रहा हैं। आज कुछ ऐसा ही नजारा चारो और नजर आ रहा हैं। कोई किसी से बात नहीं कर रहा कोई खेरखबर लेने न जा रहा है ओर न कोई आ रहा हैं। आज हमे मानव मूल्यो का एहसास हो रहा हैं। आज हमे समाज की आवश्यकता महसूस हो रही हैं। लेकिन आज हम ओर हमारा समाज, समाज के ठेकेदार सब बेबस हैं। हर कोई यही कह रहा हैं मदद करना चाहता हूँ लेकिन कैसे? काश यही बात समय रहते हमने सोची होती तो शायद आज ऐसा दौर न आता। आज के हालत के लिए भले ही हम चीन को दोषी मानते हें, लेकिन उस गलती को बढ़ाने में हमारा उससे ज्यादा योगदान हैं। हमने सोचा बाहर वाला मरे या जिये मुझे क्या फर्क पड़ता हैं। फर्क पड़ता हैं, जो आज हमारे साथ हो रहा हैं वही सब इससे पहले किसी के साथ हुआ हैं। चेत जाओ मानव हैं मानवता का अंत मत होने दो। शक्तिशाली मानव से शक्तिहीन मानवता पैदा मत होने दो। देश हित में कार्य करने हैं, लेकिन मानवता के हित के काम करके देखो, बहुत सुकून मिलेगा। ये सब ऐसे ही नहीं कह रहा हूँ। बीते दिनो ने अनुभव ओर एहसास कराया हैं, हम उन्नतिशील तो हो गए। लेकिन सिर्फ खुद के बन कर रेह गए। आज वक़्त हे खुद को समझने का अपने कर्तव्यो को जानने का। हम ये सोच कर बैठे हैं क्या करू घर से बाहर तो जा नहीं सकता। कौन कहता हे बाहर जाकर ही किसी की मदद हो सकती हैं। भले जाओ बाहर लेकिन एक समय ओर दूरी सीमा बनाकर किसी की मदद कर सकते हो। देखो कोई ऐसा तो नहीं जिसे इस बंद के दौरान भूखा सोना पढ़ रहा हो। आप अपने नजदीकी लोगो जो देश की सेवा करने में लगे हैं, उनसे संपर्क कर उनकी मदद कर सकते हो। यकीन मानिए आज संकट के समय में किए गए आपके कार्य भविष्य में आपके लिए बहुत कारगर सिद्ध होंगे। कुछ ऐसे महामानव भी हैं जो ये सोचते हैं, तनख्वा तो बन रही हैं, मजे से छुट्टी मनाने का मौका मिला हैं। संभल जाओ मूर्खो ये छुट्टी नहीं सुरक्षा हैं, इसे जनहीत में प्रयोग करे। आज आठ दिन से लोग इस वैश्विक महामारी के बारे में सुन रहे हैं, देख रहे हैं ओर बात कर रहे हैं। हर कोई डरा सा हे, सहमा सा हे। किसी को नही पता क्या होगा आगे। सिर्फ सरकार द्वारा दिये गए आदेशो की पालना कर रहा हैं। गलिया, बाजार चौराहे सब सुनसान हे, न जाने सब कहा खो सी गई हैं। हर कोई एक दूसरे को आस भरी नजर से देख रहा हैं, शायद कोई सुकून भरी खबर दे। हर कोई मौत के तांडव के खौफ से घबराया हुआ हैं। एक सुकून हैं की इस मुश्किल घड़ी में सब साथ हैं ओर नही भी। साथ काहू तो सब एक फरमान पर, घर पर बेठे हुये हे कोई विरोध नही। साथ नहीं हे अर्थात सब खुद को संभालने में लगे हैं, किसी को किसी ओर की कोई चिंता नहीं। मैं सही सब सही!
एक नजर भविष्य की ओर डाले तो पता चलता हैं, इस तरह हमारा भविष्य कुछ महत्वाकांशी सनकी राजनेताओ की उँगलियों की कठपुतली बन कर रह गया हैं। किसने किया, क्यू किया आज सभी के मन में यही सवाल उठ रहे हैं। सुबह उठते ही सबकी यही चिंता हैं, आज का दिन केसा होगा, क्या खबर मिलेगी, कुछ राहत मिलेगी या हम हमारे घरो में ही कैद रहेंगे। गोली से मरने वालों में पता तो रेहता है कौन मरेगा, यहा तो किसी को ये भी पता नहीं की वो घर में भी सुरक्षित हैं या नही। सिर्फ एक गलती ओर हर देश त्राहि त्राहि कर रहा हैं।
ये बीमारी कोई बीमारी नहीं ये आज के युग के मानव की बीमार मानसिकता है। खुद को शक्तीशाली दर्शाने के लिए लाखो लोगो की बली चड़ाने से भी नहीं चुकता। आज कोरोना चीख चीख कर कह रहा हैं, दिखाओ अपनी ताकत में अकेला हु इस दुनिया के महान वैज्ञानिको के सामने। बनाने वाला भी यही इंसान हैं ओर मरने वाला भी यही इंसान हैं। हमने प्रकृति के हर नियम को तोड़ा हैं। आज प्रकृति अपना हिसाब ले रही हैं तो घबरा गए। समाज, देश ओर दुनिया में कितनी गंदगी फैलाई हैं, प्रदूषण की मार, अनैतिकता की मार ओर न जाने क्या क्या किया हैं हमने इस प्रकृति के साथ। एक झटके में प्रकृति हिसाब लेने लगी तो हम घबरा गए। अब दिखाओ पैसे का रुतबा, कौन सा पैसा हैं जो तुम्हें इस तांडव से बचा सकता हैं। आज अमीर हो या गरीब, बूढ़ा हो या जवान सभी एक कतार में खड़े हैं। क्या दे रहे हैं हमारे नोनिहालों को, एक भयावह मौत से भरा संसार, जहा ये भी पता नहीं की वो कहा जाकर सुरक्षित हो सकता हैं। कहा गई हीरे, सोने, चाँदी की चमक, पश्चिमी सभयता की दौड़, कहा गया मॉडर्न जमाने का लूक, कुछ नहीं बचा हैं, सीधा ओर सात्विक जीवन जीने को लाचार, कोई होटल, कोई पब, कोई शॉपिंग माल कोई थियेटर नहीं। कही गमने जाने की कोई होड नहीं। कोई ऊंचा कोई नीचा नहीं आज। सभी एक समान। अपना लो इस समानता को, साथ देना हैं तो जीते जी दो। आज की परिस्थिति के हिसाब से तो मरने पर चार कंधे भी नहीं मिल पाएंगे। केसे करोगे अपने चहेतों के अंतिम संस्कार। आज क्यू नही कोई मंदिर के घंटे बजा कर, मस्जिद में अजान देकर सब कुछ ठीक करने का दावा करता हैं। किसे राष्ट्र चाहिए, किसे ओहदा चाहिए, सब नश्वर हैं। ईश्वर भी तभी साथ देता हैं जब हम किसी का साथ देने को तैयार हो। रही बात भविष्य की तो आज से सीख लो ओर भविष्य में ऐसी कोई भी गलती करने से पहले एक बार सोच कर देखना किसे चोट पहुंचा रहे हैं।
To be continued ………
Categories: Current Affairs
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